My attempt at the three sentence poetry format made popular by Gulzar:

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झुर्रियां

चेहरा वही हैं, नयी झुर्रियों से सजाया हैं;

दिल भी वोही हैं, पुराने ज़ख्मों से सजाया हैं;

काश इन ज़ख्मों पर भी झुर्रियां आ जाएँ |
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ख्वाब

कई दिनों से  एक  ही  ख्वाब  देख  रहा  हूँ,

अपने  बिस्तर पर , गहरी  नींद सो  रहा  हूँ,

दिन में देखे ख्वाब  भी  कहीं  पूरे होते हैं |

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