Been 14,600 days, today. Can’t say how many more! Important thing is to make the most of the remaining todays, looking forward to make them somewhat relevant before there is no more “today”. Until then, want to keep this hopeless optimist heart, loving and living, more importantly – Loving and Living with no receipts!

Predictably, borrowing Gulzar’s words to express my constitution today!

अभी न पर्दा न गिराओ ठहरो

के दास्ताँ आगे और भी है
ये इश्क़ गुज़रा है इक जहाँ से, इक जहाँ आगे और भी है
अभी न पर्दा न गिराओ ठहरो
अभी तो टूटी है कच्ची मिटटी
अभी तो बस जिस्म ही गिरे है
अभी कई बार मरना होगा अभी तो एहसास जी रहे है
अभी न पर्दा न गिराओ ठहरो
दिलों के भटके हुए मुसाफिर
अभी बहोत दूर तक चलेंगे
कहीं तो अंजाम के सिरों से
ये जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा न गिराओ ठहरो
के दास्ताँ आगे और भी है.…